Thursday, December 2, 2010

सोचता हूँ

सोचता हूँ

की चढ़ाऊँ प्रत्यंचा

और छोड़ दूं

शब्द बाण |
 
मगर किधर?

इस जलाशय की कलकल बहती आवाज़ पर

या पानी की हंसती खिलखिलाती अठखेलियों पर?

क्या बयाँ कर पाऊँगा यह अनन्य शान्ति का आभास?

नहीं जानता

शायद जानना भी नहीं चाहता

बस आभास

और मन के सौर्यमंडल में घूमते

सितारे-से विचार

और हर विचार एक छिपा, सोया सौर्यमंडल |

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