असंख्य गहराइयों के अचेत चैतन्य में
मै उठा |
कहीं दूर गूंजता, एक नाद-स्वर-रूप
एक विचार, पहली शान्ति से प्राचीन
शांत, जैसे अदृश्य बंधन से जुड़े हृदय
रूपहीन, जैसे बीते कल के भोजन का स्वाद |
मै जागा
और स्मृति लोप का शिकार बना
भूल गया
मेरा सर्वस्व अस्तित्व
घर छोड़ कई यात्राएं कर लौटा
पर मन के घर में बंधा रहा
मै जागृत हुआ, जन्मा |
हिमाद्री में तप-ताप से जलते प्यासे अघोरियों की ज़बान से
लामाओं के गंभीर मग्न अंतर्बोध की गूंजती गहरी ध्वनी से
ज्ञान के प्यासे मन-मस्तिष्कों की अज्ञात गहराइयों से
मै उठा |
ॐ
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