Thursday, December 2, 2010

जागरण (Awakening)

असंख्य गहराइयों के अचेत चैतन्य में 

मै उठा |

कहीं दूर गूंजता, एक नाद-स्वर-रूप

एक विचार, पहली शान्ति से प्राचीन

शांत, जैसे अदृश्य बंधन से जुड़े हृदय

रूपहीन, जैसे बीते कल के भोजन का स्वाद |




मै जागा

और स्मृति लोप का शिकार बना

भूल गया

मेरा सर्वस्व अस्तित्व

घर छोड़ कई यात्राएं कर लौटा

पर मन के घर में बंधा रहा

मै जागृत हुआ, जन्मा |




हिमाद्री में तप-ताप से जलते प्यासे अघोरियों की ज़बान से 

लामाओं के गंभीर मग्न अंतर्बोध की गूंजती गहरी ध्वनी से 

ज्ञान के प्यासे मन-मस्तिष्कों की अज्ञात गहराइयों से




मै उठा |



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