Wednesday, May 12, 2010

एक और बार (याद)

सांवली-सी, हलकी सी मुस्कान लेकर
ओ कमलनयनी, मृगगामिनी
मेरे स्वप्नों को अभिलाषित करती
खिलखिलाती, संस्फुरित करती.

एक पंख, शायद मोर का
हल्का-सा, मेरे खुरदुरे हाँथ में सिमटा
एक वीणा का तार किसी अधर में गूंजा
टिप्प - बरखा की एक बूँद भृकुटी पर सजी.

थिरकती हुई बदरी पहुंची परबत के पास

जलधार, ओ मल्हार
सारे प्राणी जागे, रंगों के अप्रतिम सौंदर्य के भाग बने
और थिरकन की तेज़ी बढ़ी
सारे रंग एक दूसरे से मिलते, भागते, खेलते,
नए रूप में बनते, और ख़त्म हो जाते
मल्हार की गति में समाते
सितार के झालर में नाचते,
स्वर-रस में नहाते

और अन्दर से गूंजता ॐ नाद
और इस सुदृश सौंदर्य, रंगों के संसार में दिखती तुम
स्वर्ण जल 
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