इस अजर भूमि में पनपता है ह्रदय
इसकी तरल वायु में मिलता सुकून
रबों में दौड़ती एक लहर, जीवन-सी
नसों में झलकता है खून.
कर दूं खुद को न्योच्छावर इस कुटीर के लिए
चला दूं तूफ़ान, आंधी - है जूनून.
शांत-चित्त जब बैठता कट्टे पर
या फिर एसिड लेक के जल प्रतिबिम्ब में झांकता
पत्तों की स्निग्ध, मद्धम नृत्य को हलकी मुस्कान के साथ देखता
दूसरों पर व्यंग्य पर ठहाके लगता
और कभी शांत हो जाता.
घर में माँ की पुकार कहीं दूर से सुनाई देती
मेरे श्वान आते, दुम मटकाते
और एक हाँथ अचानक कंधे को हलके से छूता
'जय, चल ना यार'
दोस्तों की मुस्कुराती पुकार
शांत भाव (काश!) से लेक्चर में बैठ
लास्ट बेंच में पढ़ते पढ़ते सो जाना
और ब्रेक से कभी कभी वापस ही ना आना
टिप्प! बरखा की एक रेशमी बूँद
और एक स्वछंद प्रज्वलित अनोखा सौंदर्य
इस भवन को हरी चादर उढ़ा देता
हलकी बारिश. धरती की स्निग्ध खुशबु
और गरम चाय.
सांवली-सी, हलकी सी मुस्कान लेकर
ओ कमलनयनी, मृगगामिनी
मेरे स्वप्नों को अभिलाषित करती
खिलखिलाती, संस्फुरित करती.
एक पंख, शायद मोर का
हल्का-सा, मेरे खुरदुरे हाँथ में सिमटा
एक वीणा का तार किसी अधर में गूंजा
टिप्प - बरखा की एक बूँद भृकुटी पर सजी.
थिरकती हुई बदरी पहुंची परबत के पास
जलधार, ओ मल्हार
सारे प्राणी जागे, रंगों के अप्रतिम सौंदर्य के भाग बने
और थिरकन की तेज़ी बढ़ी
सारे रंग एक दूसरे से मिलते, भागते, खेलते,
नए रूप में बनते, और ख़त्म हो जाते
मल्हार की गति में समाते
सितार के झालर में नाचते,
स्वर-रस में नहाते
और अन्दर से गूंजता ॐ नाद
और इस सुदृश सौंदर्य, रंगों के संसार में दिखती तुम
स्वर्ण जल
________.
आगोश के अंजाम से बेचैन
हर अधूरे काम से बेचैन
याद आते हर लम्हे
की कटु जुबां से बेचैन
छलछलाते सपनों के सच से बेचैन
दोस्तों की आँखों के अलविदा से बेचैन .
बेवक्त चैन और रतनारे नैन से बेचैन
घूम रहा मनगढ़ंत सागर और गिरी में
लहरों की सौम्य गहरी सी शान्ति - पर मैं बेचैन.
शायद गहराइयों में डूबे चन्द्रमा की डोर से लटकूँगा.
इस सुदृश सूरज के धधकते तेज़ में .... मैं बेचैन